Monday, July 2, 2012

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कृष्ण की गोकुल से विदाई

माता यशोदा के चरण स्पर्श कर रहे कृष्ण के मस्तक पर ममता की ऊष्मा लिये अश्रु अभिषेक कर रहे थे। बाबा नन्द जैसे जड़वत थे। सबको प्रणाम कर बलभद्र एवं कृष्ण रथ की ओर अग्रसर हुए। माता यशोदा  के गौर मुखाकृति को कान्हा के  नीलवर्ण हाथो में समेटकर ऐसे प्रतीति दे रहे थे जैसे सूर्य को नील मेघ ने आच्छादित कर दिया हो  आज कान्हा की प्रिय गौएँ के बड़े बड़े चक्षु भी अश्रु निर्झर प्रवाहित कर रहे थे। रथ के समीप खड़ी राधिका के निकट पहुँचकर चरण यंत्रवत थम गए। गोकुल की वह प्राण प्रिय सखी आज मौन थी। मुरली की मधुर तान सदृश लगने वाली वाणी की स्वामिनी आज चुप थी। किसी देवालय में प्रतिष्ठित देव प्रतिमा सम शांत। हाँ, कुछ रिक्तता थी उस देव प्रतिमा में, इस सांवरे को मोहने वाली निश्छल  मुस्कान आज मुख कमल पर न थी, था तो अश्रुओ का अथांह  सागर, जिसे नयनो के बाँध बड़ी कठिनाई से रोके थे। यमुना की जल तरंग जिस तरह प्लावन में उद्वेलित होती है, वैसे अश्रुओ  को नयन कपाट रोके हुए थे।
अब तक राधा कृष्ण का मौन संवाद शब्द का प्रारूप लेने पर बाध्य हो गया।
"राधिके, मेरी अनुपस्थिति में मैय्या, बाबा एवं नन्द गाँव का ध्यान रखना, होली, गोवर्धन उसी उल्लास एवं हर्ष उत्साह से मनाना। मेरे विछोह में यहाँ किंचित भी उदासी न छाने देना।"

अब तक देव प्रतिमा सी अविचलित खड़ी राधिका अंततः बोल पड़ी " बस करो कान्हा, और कितने दुष्कर कार्य सौंपोगे, तुम्हारे बिना होली क्या, हर दिवस रंगहीन होगा, यमुना की तरंगे रेत में अंकित तुम्हारे पद चिन्हों खोजेंगी, ये पूर्वा मथुरा में तुम्हे छूने के लिए लालायित हो पूरे वेग से उस ओर बहेंगी, तुम्हारी प्रिय पारिजात पुष्प कदाचित इस कुंजवन को सुवासित करना  ही छोड़ दे, अपनी कनिष्क पर जिस गिरिराज को तुमने धारण कर कृतार्थ  किया था, वह भी अपनी गंभीर मुद्रा को त्याग कर रोने के लिए अधीर है, और तुम कहते है सबका ध्यान रखना" इतना कहकर उस अराधिका का कंठ अवरुद्ध हो गया।
 नयनो के कोरों पर उतर आये अश्रू को पुनः चक्षु कपाट में बंद कर स्वयं को संयत कर बोली " जानती हो कान्हा, आज समस्त ब्रह्माण्ड में तुम्हे गोकुल में रोकने का सामर्थ्य मुझ में है, पर तुझमे ही एकाकार हूँ, तेरा ही प्रतिबिम्ब हूँ, गोविन्द गोपाल से युगंधर बनने की तुम्हारी यात्रा में आज तुम्हे न रोकना ही इस यात्रा में मेरा योगदान है। जानती हूँ के अब तेरे दर्शन जीवन की सांध्य वेला में होगा, तब भी तुझे गोकुल के दायित्वों से मुक्त करती हूँ, बस एक बिनती है, वृन्दावन को न भूलना, माता देवकी के स्पर्श  में मैया यशोदा का आँचल और नवनीत याद रखना, पिता वसुदेव की वाणी में बाबा नन्द को यदा कदा स्मरण कर लेना, भविष्य में जिस राज्य सभा में तारक मंडल में सूर्य की भाँती दैदीप्यमान होंगे, उसमे अपने ग्वाल सखा  द्वारा निर्मित खेल प्रांगण की छवि भी देख लेना, अपने रत्न जटित सिंहासन पर विराजमान होकर उस शिला को भी याद कर लेना जिस पर बैठ कर तुमने अपनी मुरली की तान से सबको सम्मोहित किया था। जलधि में जिस अकल्पनीय नगर का निर्माण करोगे, उसमे रहकर गोकुल को न भूलना. अपने भव्य राज प्रासाद में कभी कभी गोकुल की इन गोपिकाओ को भी याद कर लेना"

अपने को पुनः संयत कर वह आगे बोली, ' जाओ कान्हा, एक नवयुग की संरचना कर इस गोकुल और वृन्दावन को अमरत्व प्रदान करो, हां एक विनती और है, जब अपने समस्त  दायित्वो से मुक्त हो जाओ तब अपनी वृद्धा हो चुकी इस सखी से मिलने आ अवश्य जाना. तब तक यह मुरली हमें सौंप दो, ताकि गोकुल वासी तुम्हारी इस धरोहर को स्पर्श कर धन्य हो सके।"

कृष्ण जानते थे राधिके ने मुरली क्यों माँगी. मुरली उनके गोप जीवन का प्रतीक थी और यही ग्वाल जीवन मांग राधा ने उन्हें गोपालक से क्षत्रिय धर्मं केपथ  लिए मुक्त कर दिया। राधा जानती थी की भविष्य में उसके श्याम सांवरे को  इन्ही हाथो में सुदर्शन धारण करना है, तब दिव्य सुदर्शन की तीक्ष्णता और कोमल मुरली को लेकर कान्हा कभी असमंजन में न रहे, और मुरली की सुरीली तान सुदर्शन के प्रक्षेपण के समय उसकी कठोर गर्जना में दब कर न रह जाए, इसलिए प्रेम योग के इस अस्त्र को राधिका ने अपने संरक्षण में ले लिया।

कृष्ण बोले, " राधे! आज वृन्दावन का ये माखन चोर तेरा ऋणी हुआ, कितने द्वंद्व से आज तुने मुझे उबार लिया। भविष्य में एक महायुद्ध में एक  महानायक का मै सारथी बनूँगा, किन्तु गोप जीवन के खेल प्रांगन से  जीवन के समारांगन  में मेरा सारथ्य कर्म तुने किया है, कृष्ण को यहाँ से देह रूप में ही जा रहा है, वस्तुतः वह तो यहाँ के हर रज कण में, हर पत्तो  और उनमें बह रही पूर्व में रहेगा। विरह की जो तपस्या मेरी भोली सखी तू करेगी, विश्व के समस्त ऋषि मुनि की तपस्या भी उसके आगे हीन और तुच्छ  होगी, "

"  कृष्ण मथुरा के पास होकर भी मथुरा का नहीं होगा परन्तु वृन्दावन में न होकर भी सर्वदा यही रहेगा। ब्रिज में मेरे हर कर्त्तव्य  को परिपूर्ण करना, मेरे माता पिता का ध्यान रखना, उनकी सेवा करना, मेरे सखा और गौओ का भी ध्यान रखना।"

निश्चिन्त रहो कान्हा, वचन देती हूँ तुम्हे" प्रतुत्तर में इतना ही कह पायी वो अराधिका।

कृष्ण एक दीर्घ दृष्टि में हमेशा के लिए अपनी सखी की छवि को अंकित कर रथारूढ़ हुए, अश्व संकेत पाकर अपने गंतव्य को दौड़ पड़े, ओझल होते गोकुल से सिर्फ एक छवि दृष्टिगत थी, राधा की।





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